नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में वन भूमि पर हो रहे अतिक्रमण और अवैध कब्जों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस गंभीर मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है।
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड में वन भूमि पर निजी संस्थाओं द्वारा कब्जे की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, जो अत्यंत चिंताजनक है।
🔍 फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) को निर्देश दिए हैं कि वे एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन करें। यह समिति पूरे मामले की गहन जांच कर यह पता लगाएगी कि—
वन भूमि पर कितनी जगह अतिक्रमण हुआ है
किन निजी संस्थाओं या व्यक्तियों ने कब्जा किया
संबंधित अधिकारियों की भूमिका और लापरवाही क्या रही
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह समिति अपनी रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगी।
अदालत ने आदेश दिया है कि वन भूमि पर चल रही सभी निर्माण गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोका जाए। साथ ही, किसी भी प्रकार के थर्ड पार्टी अधिकार (Third Party Rights) बनाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
⚖️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वन भूमि की सुरक्षा संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण और जंगलों की रक्षा के लिए यदि सख्त कदम उठाने पड़े तो कोर्ट पीछे नहीं हटेगा।
इस मामले में अगली सुनवाई कोर्ट के शीतकालीन अवकाश के बाद तय की जाएगी, जिसमें फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर विस्तृत चर्चा होगी।
यह फैसला उत्तराखंड में वन संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता को दर्शाता है। आने वाले दिनों में इस आदेश का राज्य में बड़े स्तर पर असर देखने को मिल सकता है।













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